विशेष खोजी रिपोर्ट
नई दिल्ली। प्रिंट मीडिया और पत्रकारिता जगत के नाम पर केवल सरकारी विज्ञापन (Govt Ads) डकारने, रेलवे पास और रौबदार एक्रेडिटेशन कार्ड (Accreditation Card) चमकाकर ‘दलाली और ब्लैकमेलिंग का धंधा’ चलाने वाले प्रकाशकों की रातों की नींद अब उड़ने वाली है। भारत सरकार के प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (PRGI) ने एक ऐसा ‘तेजाबी’ आदेश जारी किया है, जो कागजी शेरों और डमी अखबारों के पूरे सिंडिकेट को जमींदोज करने का दम रखता है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाले PRGI कार्यालय ने एडवाइजरी संख्या 11 of 2026 जारी कर साफ कर दिया है कि नए प्रेस एवं आवधिक प्रकाशन पंजीकरण अधिनियम, 2023 (PRB Act, 2023) के तहत अब कोई भी चालाकी या ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। वित्तीय वर्ष 2024-25 की वार्षिक विवरणी (Annual Statement) जमा करने की अंतिम तिथि 30 जून 2026 तय की गई है। इसके बाद समय-सीमा में एक दिन का भी विस्तार नहीं किया जाएगा।
नया ट्रेंड: जमीन पर ‘शून्य’, वॉट्सऐप और फेसबुक पर ‘सुपरहिट’!
आजकल प्रिंट मीडिया में एक नया और अनोखा ढोंग देखने को मिल रहा है। कई स्वयंभू ‘प्रधान संपादकों’ ने नया पैंतरा निकाला है—जमीन पर उनका अखबार ढूँढे से नहीं मिलता, हॉकर उसका नाम तक नहीं जानते, लेकिन सुबह होते ही ये प्रकाशक अपने अखबार की 2-4 पन्नों की फर्जी पीडीएफ (PDF) बनाकर वॉट्सऐप ग्रुपों और फेसबुक (Facebook) पर डाल देते हैं। सोशल मीडिया पर ‘लाइक और कमेंट’ बटोरकर अधिकारियों को यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि उनका अखबार पूरे इलाके में तहलका मचा रहा है!
सच्चाई यह है कि यह सिर्फ ‘वाहवाही’ बटोरने और ब्लैकमेलिंग का नया डिजिटल हथियार है। सोशल मीडिया पर पीडीएफ की नुमाइश करने वाले ये शातिर प्रकाशक सरकार को यह कभी नहीं बताते कि उनके अखबार की हार्ड कॉपी (कागज पर छपाई) असल में कितनी छप रही है और कितने पाठकों तक पहुँच रही है?
पब्लिसिटी और इनफॉर्मेशन डिपार्टमेंट भी आंखें खोले, अब कड़ा रुख जरूरी!
PRGI के इस कड़े कदम के साथ-साथ अब राज्यों के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (DIPR / Information Department) और पब्लिसिटी विभागों को भी कुंभकर्णी नींद से जागना होगा। इन विभागों की नाक के नीचे यह पूरा खेल चल रहा है।
अधिकारी सिर्फ टेबल पर आने वाली पीडीएफ और फाइल में लगी कतरनों को देखकर सरकारी विज्ञापनों की मलाई बांट देते हैं।
अब वक्त आ गया है कि सूचना विभाग भी कड़ा रुख अपनाए। जो अखबार सिर्फ वॉट्सऐप और फेसबुक की पीडीएफ तक सीमित हैं, जो बाजार में बिकते ही नहीं, उनका सरकारी पैनल तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए।
सिर्फ डिजिटल पीडीएफ दिखाकर विज्ञापन और एक्रेडिटेशन कार्ड का मजा लेने वाले इन ‘कागजी सूरमाओं’ की जमीनी जांच (Physical Verification) होनी चाहिए कि क्या वाकई में इनकी कोई प्रिंटिंग प्रेस चल भी रही है या नहीं?
PRGI का ‘जुर्माना चक्रव्यूह’: जेब खाली करने का पूरा इंतजाम
अगर कोई प्रकाशक इस कड़े कानून के बाद भी खुद को शातिर समझता है, तो PRGI ने उसकी जेब ढीली करने का भी पूरा बंदोबस्त कर लिया है:
1. प्रथम बार चूक (First Default): नियम तोड़ते ही सीधे ₹10,000 का कड़ा जुर्माना। कोई माफी नहीं, कोई पैरवी नहीं।
2. लगातार चूक (Subsequent Default): यदि अगले साल भी चालाकी दिखाने की कोशिश की, तो जुर्माने की राशि सीधे दोगुनी यानी ₹20,000 हो जाएगी।
3. अधिकतम सीमा: यह जुर्माना हर साल दोगुना होते हुए अधिकतम ₹2,00,000 (दो लाख रुपये) तक पहुंच सकता है।
एक्रेडिटेशन का रौब और मुफ्त की रेवड़ियों का अंत
खुद को संपादक बताकर अधिकारी वर्ग पर रौब जमाना, टोल टैक्स माफी के कार्ड बनवाना, रेलवे के कंसेशन पास का मजा लेना और सरकारी एक्रेडिटेशन का फायदा उठाकर ठेकेदारी चमकाना—यह कई फर्जी पत्रकारों का परमानेंट प्रोफेशन बन चुका है।
लेकिन PRB एक्ट 2023 की धारा 14 (1)(b) और 14(3) ने इस पूरी व्यवस्था की जड़ पर प्रहार किया है। जब ये ‘पीडीएफ वाले प्रकाशक’ ऑनलाइन प्रेस सेवा पोर्टल (PSP) पर सीए (CA) से ऑडिटेड स्टेटमेंट नहीं दे पाएंगे, तो इनका सर्कुलेशन डेटा शून्य माना जाएगा। इसके बाद न तो केंद्र सरकार (CBC) से कोई विज्ञापन मिलेगा और न ही राज्यों के सूचना विभागों से एक ढेला नसीब होगा।
अब समय आ गया है कि प्रिंट मीडिया के इस कचरे को साफ किया जाए। सच्चा और ईमानदार पत्रकार जो धूप-बरसात में मेहनत कर, जेब से पैसे लगाकर अखबार निकालता है, उसे उसका हक नहीं मिल पाता क्योंकि बजट का बड़ा हिस्सा ये कागजी और वॉट्सऐप वाले मगरमच्छ डकार जाते हैं। PRGI का यह कड़ा रुख और सूचना विभागों की संभावित सख्ती पत्रकारिता की शुचिता को बहाल करने के लिए ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित होगी। अब देखना यह है कि 30 जून की रात 12 बजे कितनों की दुकानें हमेशा के लिए बंद होती हैं!











